Tuesday, 14 July 2015

संकटमोचन हनुमान की जय

संकटमोचन हनुमान जी आपकी सभी मनोकामना पूर्ण करते है। हनुमान जी आपकी सभी संकटों से रक्षा करते हैं।


बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।
 ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो।
 देवन आनि करी बिनती तब छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो।
 को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥१॥
 बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो।
 चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो।
 कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो।
 को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥२॥
 अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो।
 जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो।
 हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो।
 को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥३॥
 रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो।
 ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो।
 चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
 को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥४॥
 बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो।
 लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो।
 आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो।
 को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥५॥
 रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग कि फाँस सबै सिर डारो।
 श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो।
 आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो।
 को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥६॥
 बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो।
 देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो।
 जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो।
 को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥७॥
 काज कियो बड़ देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
 कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो।
 बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कुछ संकट होय हमारो।
 को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥
दोहा
 लाल देह लाली लसे अरू धरि लाल लँगूर।
 बज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि सूर॥


जपो राम राम राम राम



Monday, 6 July 2015

राम राम राम राम बजरंगबली

दोहा
 श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि। बरनउँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
 बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।।





चौपाई
 जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥
 राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥
 महाबीर बिक्रम बजरंगी,  कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥
 कंचन बरन बिराज सुबेसा,  कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥
 हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे,  काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥
 शंकर सुवन केसरी नंदन,  तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥
 विद्यावान गुनी अति चातुर,  राम काज करिबे को आतुर॥७॥
 प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया,  राम लखन सीता मन बसिया॥८॥
 सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा, विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥
 भीम रूप धरि असुर सँहारे, रामचंद्र के काज सँवारे॥१०॥
 लाय संजीवन लखन जियाए, श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥११॥
 रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥१२॥
 सहस बदन तुम्हरो जस गावै, अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥
 सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥
 जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥
 तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा,  राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥
 तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना, लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥
 जुग सहस्त्र जोजन पर भानू,  लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥
 प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं, जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं॥१९॥
 दुर्गम काज जगत के जेते,  सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥
 राम दुआरे तुम रखवारे,  होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥
 सब सुख लहैं तुम्हारी सरना,  तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥
 आपन तेज सम्हारो आपै,  तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥
 भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥
 नासै रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥
 संकट तै हनुमान छुडावै, मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥२६॥
 सब पर राम तपस्वी राजा, तिन के काज सकल तुम साजा॥२७॥
 और मनोरथ जो कोई लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥
 चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥
 साधु संत के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥
 अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
 राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥
 तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥
 अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥
 और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥
 संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥
 जै जै जै हनुमान गोसाई, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥
 जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहिं बंदि महा सुख होई॥३८॥
 जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥३९॥
 तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥




दोहा
 पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥